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जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र में भूमि अधिकारों पर राजनीतिक घमासान देखने को मिलेगा। पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने-अपने बिल पेश करेंगी, जिसमें भूमि पर कब्जाधारकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। पीडीपी का एंटी-बुलडोजर बिल और नेशनल कॉन्फ्रेंस का भूमि अनुदान बिल मुख्य आकर्षण होंगे। कश्मीर के जानकार जावेद अहमद मलिक ने इसे कश्मीरियों की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बताया है।

श्रीनगर। जम्मू कश्मीर विधानसभा के आगामी सत्र में सत्ताधारी दल और उसके प्रमुख विरोधियों के बीच खुद को जम्मू कश्मीर का सबसे बड़ा संरक्षक साबित करने की होड़ देखने को मिलेगी। दोनों दलों के बीच खुद को जम्मू कश्मीर का सबसे बड़ा झंडाबरदार साबित करने की एक स्पर्धात्मक राजनीति खूब होगी। इसका संकेत दोनों दलों ने जमीनों पर कब्जाधारकों के अधिकार को सुनिश्चित बनाने संबंधी अलग-अलग निजी बिल लाने का एलान कर दिया है।

पीडीपी का एंटी बुलडोजर बिल

पीडीपी ने अपने प्रस्तावित विधेयक को एंटी बुलडोजर बताया है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा कि वर्ष 2019 के बाद से प्रदेश में किसी भी जगह को सरकारी बताकर वहां बसे लोगों को बेघर किया जा रहा है, होटल मालिकों को आबंटित जमीन का पट्टा बढ़ाने के बजाय उसे रद्द किया जा रहा है। सरकार की बुलडोजर नीति के खिलाफ हमने बिल लाया है जो उन व्यक्तियों, परिवारों और संस्थाओं को, जो 30 वर्षों से अधिक समय से भूमि पर लगातार काबिज हैं, मालिकाना हक सुनिश्चित करते हुए उन्हें बेदखली के डर से आजाद बनाएगा।

नेशनल कान्फ्रेंस का जमीन अनुदान बिल

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा कि उनका बिल जमीनों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों को सुरक्षित बनाता है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख प्रवक्ता और विधायक तनवीर सादिक ने कहा कि हमने भी जमीनों पर स्थानीय लोगों और कब्जाधारकों के अधिकार सुरक्षित रखने के लिए एक निजी विधेयक जम्मू कश्मीर लैंड ग्रांट्स (रिस्टोरेशन एंड प्रोटेक्शन) बिल लाने का फैसला किया है। यह 2022 के बदलावों को पूर्ववत करने, स्थानीय पट्टाधारकों, सार्वजनिक संस्थानों की रक्षा करने और मूल 1960 के ढांचे को बहाल करने के लिए है।

कश्मीर मामलों के जानकार की राय

कश्मीर मामलों के जानकार जावेद अहमद मलिक ने कहा कि जमीन, रोजगार, राज्य का दर्जा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो आम कश्मीरियों की भावनाओं से, उनकी पहचान और संस्कृति से जुड़े हुए हैं। लोगों में एक डर है कि यहां उनकी जमीनें और रोजगार उनके हाथ से जा रहा है। इसलिए हरेक राजनीतिक दल के लिए यह खुद के कश्मीर का चैंपियन साबित करने के लिए आसान उपाय है। इसलिए सभी इसे अपना रहे हैं और एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास करेंगे। लेकिन सभी जानते हैं कि निजी बिल सदन में पारित नहीं होता। अगर जम्मू कश्मीर का इतिहास देखेंगे तो शायद दो या तीन बार ही ऐसा हुआ होगा।

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