सामयिक रचना - 12.1.2026
बरेली
कभी- कभी तो बड़े प्रात ही, आ जाता कुहरा।
और कभी दिन चले रात को, गहराता कुहरा।।
कभी पेड़ पर, कभी सड़क पर, ये छाया रहता,
मन आ जाता तो घर - आंगन, इतराता कुहरा।।
पोखर, ताल, नदी सब पर ही, चादर बन छाता,
चमकी धूप तो पक्षी बनकर, उड़ जाता कुहरा।।
आंखों में ये रेतकणों सा, चुभ - चुभ जाता है,
और कभी शीतल जलकण सा, मन भाता कुहरा।।
अभी यहां था, अभी वहां था, मनमौजी दिखता,
कभी नवेली दुल्हन जैसा, शरमाता कुहरा।।
मुठ्ठी में हम पकड़ के इसको, जेबों में भर लें,
पर मुठ्ठी से कुछ ही पल में, छन जाता कुहरा।।
बैर धूप से रखता फिर भी, मन ही मन डरता,
धूप खिली तो मन ही मन में, घबराता कुहरा।।
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