त्योहारों का आत्ममंथन: उत्सव या पाखंड*?
संतोष तिवारी: बैंक अधिकारी, स्वतंत्र और मानद लेखक
भारत को उत्सवों की भूमि कहा जाता है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संदेश का वाहक भी है। किंतु विडंबना यह है कि समय के साथ अनेक त्योहारों का स्वरूप अपने मूल उद्देश्यों से भटकता हुआ दिखाई दे रहा है। आज आवश्यकता है कि हम परंपरा और पाखंड के बीच स्पष्ट भेद करें, और स्वयं से प्रश्न पूछें—क्या हम वास्तव में धर्म का पालन कर रहे हैं या केवल सामाजिक दबाव में प्रवाहित हो रहे हैं?
होली का संदेश: आंतरिक दहन, बाहरी नहीं
होली का पौराणिक आधार प्रह्लाद और होलिका की कथा में निहित है। यह कथा हमें बताती है कि अहंकार, अत्याचार और अधर्म का अंत निश्चित है, जबकि सत्य और भक्ति की विजय होती है। होलिका दहन का वास्तविक अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार को जलाना।
किन्तु आज होली का दृश्य अनेक स्थानों पर चिंताजनक है। जबरन रंग लगाना, रासायनिक रंगों से शरीर और पर्यावरण को हानि पहुँचाना, कीचड़ और गंदगी फेंकना, अश्लील गीतों और गालियों का प्रयोग करना—क्या यह धर्म है?
प्राचीन भारत में टेसू के फूलों, चंदन, हल्दी और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था। रंग प्रेम और समानता का प्रतीक थे। किंतु जब रंग किसी की इच्छा के विरुद्ध अपमान का माध्यम बन जाए, तब वह उत्सव नहीं, उच्छृंखलता बन जाता है।
महाशिवरात्रि और संयम का संदेश
महाशिवरात्रि आत्मसंयम और तप का पर्व है। भगवान शिव योग और वैराग्य के प्रतीक माने जाते हैं। उनका स्वरूप हमें साधना, ध्यान और आंतरिक अनुशासन की प्रेरणा देता है।
फिर प्रश्न उठता है—क्या नशा और अतिरेक इस पर्व का अंग हो सकते हैं? भांग सेवन को लोकाचार का रूप तो मिला है, परंतु शास्त्रीय अनिवार्यता का प्रमाण नहीं मिलता। यदि शिव तप और संयम के आदर्श हैं, तो उनकी आराधना भी उसी भाव से होनी चाहिए।
*सामाजिक दबाव और धार्मिक विवशता*
आज अनेक लोग यह स्वीकार करते हैं कि वे कुछ परंपराओं में केवल इसलिए भाग लेते हैं क्योंकि परिवार या समाज ऐसा करता है। “लोग क्या कहेंगे” का भय उन्हें विवश कर देता है।
धर्म का आधार विवेक है, भीड़ का अनुसरण नहीं। यदि किसी आचरण में नैतिकता, मर्यादा और आत्मसम्मान का ह्रास हो रहा हो, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है।
ओशो का दृष्टिकोण
प्रख्यात आध्यात्मिक चिंतक ओशो ने अपने प्रवचनों में कहा था कि उत्सव का अर्थ है चेतना का विस्तार, न कि अचेतनता में डूब जाना। उनके अनुसार, “उत्सव वह है जो आपको अधिक सजग बनाए; यदि वह आपको बेहोश और उन्मादी बना दे, तो वह धर्म नहीं, भीड़ का उन्माद है।”
यह विचार हमें याद दिलाता है कि आध्यात्मिकता का सार आंतरिक जागृति है, बाहरी प्रदर्शन नहीं।
आर्य समाज का सुधारवादी दृष्टिकोण
सामाजिक और धार्मिक सुधार की दिशा में आर्य समाज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटने और अंधविश्वासों का त्याग करने का आह्वान किया। उनका स्पष्ट मत था कि धर्म का अर्थ है सत्य, संयम और समाजहित; किसी भी प्रकार का पाखंड या अनैतिक आचरण धर्म नहीं हो सकता।
यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है। यदि किसी परंपरा में विवेक का स्थान अंधानुकरण ले ले, तो सुधार की आवश्यकता होती है।
धर्म का वास्तविक अर्थ
धर्म केवल अनुष्ठानों का समूह नहीं है। यह आचरण की शुद्धता, विचारों की पवित्रता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का नाम है। यदि त्योहार हमें हिंसा, अपमान या अतिरेक की ओर ले जाएँ, तो हमें ठहरकर आत्ममंथन करना चाहिए।
त्योहारों का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। वे आनंद और सौहार्द का संदेश देते हैं, भय और असुविधा का नहीं।
समाधान: उत्सव का पुनरुत्थान
प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों का प्रयोग
किसी की अनुमति के बिना रंग न लगाना| नशा और अश्लीलता से दूरी
होलिका दहन के समय आंतरिक विकारों का प्रतीकात्मक त्याग
महाशिवरात्रि पर ध्यान, उपवास और आत्मसंयम| यदि हो सके तो इन त्योहारों में मांसाहार न करनें का भी संकल्प लें ताकि जीव हत्या से भी दूर हो सकें|
यह विरोध का नहीं, सुधार का मार्ग है। हमें त्योहारों का बहिष्कार नहीं करना, बल्कि उन्हें उनके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करना है।
धर्म का सार आत्मशुद्धि और समाजहित है। यदि हम त्योहारों को केवल बाहरी प्रदर्शन का माध्यम बना दें, तो उनका आध्यात्मिक महत्व समाप्त हो जाता है।
आइए, हम यह संकल्प लें कि उत्सवों को उन्माद नहीं, उत्साह का माध्यम बनाएँगे; पाखंड नहीं, प्रामाणिकता अपनाएँगे; और बाह्य रंगों से अधिक अपने अंदर के अंधकार को दूर करने का प्रयास करेंगे।
यही सच्ची श्रद्धा है।यही सच्चा धर्म है।
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